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The Language of Almost

  • 7 hours ago
  • 2 min read

By Vaibhav Pathak



Vaitarni


ओ मेरे मंझी गंगा, जमना

पार लगाया तूने वैतरणी भी, तू

पार लगा दे, दूर ले चल मुझे

इस पीर मावादी दुनिया से

इस दुख-पीड़ा की सभा से

इस दौलत के दीवानों से

इस हवस के परवानों से

यहाँ जहाँ जिस्म बिकता है

यहाँ जहाँ हुस्न बिकता है

मुहब्बत जहाँ व्यापार है

अक़ीदत बिना पूरा संसार है

औरत की औकात नहीं दुनिया में

मर्दों का सौभाग्य है ये दुनिया

बिस्मिल जो रोए यहाँ

किन्नर कहलाता है

दुख जो बाँटे अपने

कमज़ोर वह कहलाता है

क्या ये दुनिया है तेरी?

यहाँ बहती है गंगा

यहाँ बहती है जमना

नहीं चाहिए पवित्र

पानी इस पापी धरती का

मौत जहाँ शांति है

जीवन यहाँ अशांति है

लिखे तो क्या लिखे बिस्मिल

कि दुनिया ही बदहवासी है

ये क्या है पागलपन मेरा

ये क्या है दीवानापन मेरा

कुसूर नहीं यहाँ सभी का

इन लफ़्ज़ों को जो तोड़ते हैं यहाँ

इन हरफ़ों को मरोड़ते हैं यहाँ

नहीं है बोला वो ग़ालिब ने

नहीं है बोला वो मीर ने

मैं अब ये बोलता यहाँ

इस बदहवासी के आलम में

इस रंज-ओ-ग़म की रातों में

ले चल मंझी मुझे, पार ले चल

वैतरणी मुझे बुलाती है

आत्माएँ चीख-चीख

के मुस्कुराती हैं


Anamika


श मुझे तुमसे मोहब्बत न होती 

तो ये ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत सी होती

ये रंज-ओ-ग़म-ए-शाम न होती

ये अश्कों की बारात न ही होती

ये प्यालों में जाम न होती

काश मुझे तुमसे मोहब्बत न होती


ये मेरे आँसुओं की नदिया न होती

ये ज़ुबान पे सर्द सिसकियाँ न होती

ये मेरे शेरों में उदासी न होती

ये हरफ़ों के पीछे रुसवाई न होती

न देखता मैं अब अरमान

रातें सुहानी चाँदनी की

कि अमावस सा छा गया है

मेरी पूरी ज़िंदगी पे...


काश तेरी आँखों में काली न होती

काश होंठों की ये लाली न होती

काश हमारी यादें इतनी सुहानी न होतीं

काश तेरा ये आशिक़ाना न होता

काश हमारा ये अफ़साना न होता


ख़िज़ाँ में मेरे फूलों को

बहार में मुरझाना न होता

मेरा और कुछ न कभी भी होता

न कभी ये दुख होता

न कभी ये रंजिश होती

काश तुझे मुझसे मोहब्बत होती

तो ये ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत होती

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